रायपुर, 13 अक्टूबर। कलिंगा विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय की ओर से 5 से 12 अक्टूबर 2026 तक ‘टीचर इनोवेशन चैलेंज: लर्न, क्रिएट एंड टीच’ विषय पर सात दिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें शिक्षकों और भावी शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल तकनीक और विद्यार्थियों पर केंद्रित शिक्षा के नए तरीकों से परिचित कराया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य पारंपरिक व्याख्यान आधारित शिक्षण से आगे बढ़कर ऐसी शिक्षण पद्धतियों को प्रोत्साहित करना था, जिनमें तकनीक, रचनात्मकता, व्यावहारिक गतिविधियों और विद्यार्थियों की सहभागिता को प्राथमिकता दी जाए। एमओयू (MoU) साझेदारों के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने शिक्षकों को कक्षा की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षण संसाधन तैयार करने और नवीन शैक्षणिक तकनीकों का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।

सात विषयों पर विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव
कार्यशाला के दौरान विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों ने सात विषयगत सत्रों का संचालन किया। इनमें AI आधारित शिक्षण, गतिविधि आधारित पढ़ाई, डिजिटल संसाधनों का निर्माण, समावेशी कक्षा प्रबंधन, योग्यता आधारित मूल्यांकन और शिक्षकों के व्यावसायिक विकास जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे। प्रतिभागियों ने शिक्षण प्रदर्शन, रोल-प्ले, सहकर्मी मूल्यांकन और व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से अपने कौशल को विकसित किया।

5 अक्टूबर को दीवान वीएस इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के डॉ. विकास भारद्वाज ने ‘एआई टीचिंग विजार्ड चैलेंज’ सत्र का संचालन किया। इसमें सूक्ष्म शिक्षण प्रदर्शन और सहकर्मी मूल्यांकन के जरिए प्रभावी शिक्षण तकनीकों पर जोर दिया गया।
6 अक्टूबर को इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय, मीरपुर के डॉ. बिजेंद्र सिंह ने ‘टीच विदाउट ए टेक्स्टबुक’ विषय पर सत्र लिया। उन्होंने कहानी, खेल, थिएटर और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुओं के माध्यम से पढ़ाई को रोचक और सुलभ बनाने के तरीकों की जानकारी दी।
7 अक्टूबर को देवसंस्कृति कॉलेज ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी की सहायक प्राध्यापक डॉ. ज्योति दुबे ने ‘टीच इन फाइव मिनट्स!’ सत्र में डिजिटल उपकरणों की उपयोगिता बताई। उन्होंने समझाया कि किस तरह तकनीक की मदद से पाठ योजना, दृश्य सामग्री, प्रश्नोत्तरी और वर्कशीट तैयार करने की प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जा सकता है।
8 अक्टूबर को सांदीपनि अकादमी, दुर्ग की प्राचार्य डॉ. स्वाति श्रीवास्तव ने ‘क्लासरूम क्राइसिस: यू आर द टीचर!’ विषय पर संवादात्मक कार्यशाला आयोजित की। इसमें रोल-प्ले और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित गतिविधियों के जरिए चुनौतीपूर्ण कक्षा स्थितियों से निपटने तथा समावेशी शिक्षण वातावरण विकसित करने पर चर्चा हुई।
9 अक्टूबर को महात्मा गांधी बालिका विद्यालय (पीजी) कॉलेज, फिरोजाबाद की डॉ. संध्या द्विवेदी ने ‘द असेसमेंट डिटेक्टिव’ सत्र का नेतृत्व किया। इसमें पारंपरिक मूल्यांकन पद्धतियों को अधिक प्रभावी बनाने, सामान्य प्रश्नों को वास्तविक जीवन की समस्याओं, पहेलियों और योग्यता आधारित आकलन में बदलने के तरीकों पर प्रकाश डाला गया।
10 अक्टूबर को कोलंबिया कॉलेज, रायपुर के प्राचार्य डॉ. अरुण कुमार दुबे ने ‘द टीचर सुपरपावर चैलेंज’ का संचालन किया। इस सत्र में प्रतिभागियों ने रचनात्मक अभ्यासों, संवादात्मक आत्म-परिचय और व्यक्तिगत ‘टीचर विजन कार्ड’ के माध्यम से अपनी शिक्षण क्षमताओं को पहचानने का प्रयास किया।
12 अक्टूबर को सेंट थॉमस कॉलेज, भिलाई की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीलम गांधी के नेतृत्व में ‘द एजुकेशन इनोवेशन एक्सपो’ के साथ कार्यशाला का समापन हुआ। इसमें कम लागत वाली और पुनः उपयोग की जा सकने वाली सामग्रियों से शिक्षण नवाचार प्रस्तुत करने पर जोर दिया गया। इस गतिविधि ने शिक्षा में रचनात्मकता, संसाधनों के बेहतर उपयोग और सभी विद्यार्थियों तक सीखने के अवसर पहुंचाने के महत्व को रेखांकित किया।
आयोजन समिति ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यशाला का आयोजन सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षा शर्मा के नेतृत्व में किया गया। उन्होंने आयोजन सचिव की जिम्मेदारी निभाई। डॉ. सरोज नायर समन्वयक रहीं, जबकि डॉ. डी. कालिदास, डॉ. संजीव कुमार यादव और डॉ. इमैनुएल हंस ने सह-समन्वयक के रूप में योगदान दिया। प्रीतम कुमार पटेल ने तकनीकी समन्वयक की भूमिका निभाई। कार्यक्रम का मार्गदर्शन शिक्षा संकाय की अधिष्ठाता प्रो. डॉ. श्रद्धा वर्मा ने किया।
गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा की दिशा में पहल
कलिंगा विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के अनुसार, यह कार्यशाला संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप आयोजित की गई। इनमें SDG 4 के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, SDG 9 के तहत उद्योग एवं नवाचार, SDG 10 के तहत असमानताओं में कमी और SDG 17 के तहत लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए साझेदारी पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यशाला ने शिक्षक प्रशिक्षण में आधुनिक डिजिटल संसाधनों, समावेशी शिक्षाशास्त्र और विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग की भूमिका को सामने रखा। व्यावहारिक चुनौतियों, सहकर्मी शिक्षण और शिक्षण प्रदर्शनों के माध्यम से प्रतिभागियों को अपने नवीन विचारों को वास्तविक कक्षा में लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य ऐसे चिंतनशील, अनुकूलनशील और रचनात्मक शिक्षकों को तैयार करना था, जो विद्यार्थियों की बदलती जरूरतों के अनुरूप शिक्षण पद्धतियों को विकसित कर सकें। विश्वविद्यालय का मानना है कि तकनीक और नवाचार के समन्वय से शिक्षा को अधिक प्रभावी, सुलभ और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।



