रायपुर, 19 अक्टूबर 2026। दशहरे पर हर साल रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। मैदानों में रावण के विशाल पुतले जलते हैं, आतिशबाजी होती है और जय श्रीराम के जयघोष गूंजते हैं। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल आज भी समाज के सामने खड़ा है—जब रावण हर साल जलता है, तो फिर सीता का हरण क्यों नहीं रुकता? क्या बुराई के प्रतीक का पुतला जलाने भर से समाज की बुराइयां समाप्त हो जाती हैं?
भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, श्रद्धा, प्रेम और सृजन का प्रतीक माना गया है। हम मां दुर्गा की आराधना करते हैं, सीता के त्याग और मर्यादा का स्मरण करते हैं तथा राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती के प्रेम का गुणगान करते हैं। धार्मिक आयोजनों में नारी शक्ति की महिमा का बखान किया जाता है, लेकिन जब किसी महिला के सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा की बात आती है, तो यही समाज कई बार सवालों के घेरे में खड़ा नजर आता है।

आज भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न, अपहरण और दुष्कर्म जैसी घटनाएं समाज को झकझोरती हैं। कहीं बेटियों पर तेजाब से हमला होता है, तो कहीं महिलाओं की अस्मिता को कुचलने की कोशिश की जाती है। ये घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच और संस्कारों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

क्या देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वाला समाज जीवित नारी के सम्मान के सामने भी उतना ही संवेदनशील है? यही वह सवाल है, जिसका जवाब हमें अपने व्यवहार और अपनी सोच में तलाशना होगा।
असली रावण हमारे भीतर है
रावण का पुतला जलाना आसान है, लेकिन अपने भीतर छिपे अहंकार, वासना, हिंसा और स्त्री के प्रति भेदभावपूर्ण सोच को समाप्त करना कहीं अधिक कठिन है। असली रावण वह मानसिकता है, जो महिला को स्वतंत्र व्यक्तित्व मानने के बजाय अपनी इच्छा के अनुसार चलने वाली वस्तु समझती है। वह सोच, जो उसकी सहमति को नजरअंदाज करती है, उसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है और उसके सपनों को सीमित करने का प्रयास करती है।
नारी का सम्मान किसी की कृपा या उपकार नहीं, बल्कि उसका मौलिक अधिकार है। उसकी अपनी इच्छाएं हैं, भावनाएं हैं, सपने हैं और अपना आत्मसम्मान है। उसे अपने जीवन के फैसले लेने, अपनी बात रखने और भयमुक्त वातावरण में जीने का पूरा अधिकार है।
अक्सर महिलाओं को मां, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में सम्मान देने की बात कही जाती है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या सम्मान पाने के लिए किसी महिला का हमारे परिवार से जुड़ा होना जरूरी है? क्या किसी अनजान महिला की गरिमा कम हो जाती है, क्योंकि वह हमारी बहन या बेटी नहीं है?
नारी का सम्मान उसके किसी रिश्ते से नहीं, बल्कि उसके इंसान होने से होना चाहिए।
बेटों को संस्कार, बेटियों को आत्मविश्वास
महिलाओं के प्रति सम्मानजनक सोच विकसित करने की शुरुआत घर से ही होती है। बच्चों को बचपन से सिखाना होगा कि किसी की इच्छा और सहमति का सम्मान करना, महिलाओं की स्वतंत्रता को स्वीकार करना और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही सच्चे संस्कार हैं।
बेटियों को सुरक्षा के नाम पर सीमित करने के बजाय आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की राह दिखानी होगी। वहीं बेटों को यह समझाना होगा कि ताकत का अर्थ किसी पर नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है।
परिवार, विद्यालय, समाज और प्रशासन—सभी की जिम्मेदारी है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को सामान्य मानने वाली मानसिकता का विरोध करें। कानून का प्रभावी क्रियान्वयन, पीड़ितों को न्याय और समाज की सक्रिय भागीदारी ही सुरक्षित वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इस दशहरे पर अपने भीतर के रावण का करें दहन
दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। यह हमें याद दिलाता है कि बुराई पर अच्छाई की विजय तभी सार्थक है, जब हम अपने जीवन में भी अच्छाई को अपनाएं।
इस बार संकल्प लें कि किसी महिला के साथ अन्याय होते देखकर चुप नहीं रहेंगे। बेटियों को डर नहीं, आत्मविश्वास देंगे। बेटों को केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी का अर्थ भी समझाएंगे। महिलाओं की गरिमा, उनकी सहमति और उनकी स्वतंत्रता को अपने व्यवहार का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे।
जिस दिन नारी को देवी के रूप में पूजने के साथ-साथ एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में सम्मान मिलने लगेगा, उसी दिन दशहरे का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
याद रखिए, रावण का पुतला जलाने से परंपरा निभती है, लेकिन नारी का सम्मान करने से समाज संस्कारित होता है।
इस बार रावण केवल मैदान में नहीं, अपने भीतर भी जलाइए। क्योंकि नारी का सम्मान ही सच्चे अर्थों में बुराई पर अच्छाई की विजय है।


