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शरिया कोर्ट पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की दोटूक: निजी धार्मिक संस्था नहीं कर सकती तलाक का कानूनी फैसला, इदारा-ए-शरिया का आदेश अमान्य

बिलासपुर, 09 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े मामले में स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट कानूनी अदालत नहीं है। ऐसी संस्था विवाह, तलाक या किसी व्यक्ति के वैवाहिक दर्जे का न्यायिक निर्धारण नहीं कर सकती।

रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को एक महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित करते हुए आदेश जारी किया था। हाई कोर्ट ने इस आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया।

पति-पत्नी के विवाद के बाद तलाक की प्रक्रिया

टिकरापारा रायपुर निवासी महिला की पहले पति की वर्ष 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद 18 जुलाई 2020 को उनका विवाह मोहम्मद आबिद खान से हुआ। विवाह के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया।

 

 

महिला के अनुसार विवाद के बाद पति की ओर से तलाक की प्रक्रिया शुरू की गई। पति ने दावा किया कि उन्होंने तलाक-ए-हसन तीन चरणों में 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को संचार के माध्यम से घोषित किया था।

उत्पीड़न की शिकायत के बाद FIR

महिला ने पति और ससुराल वालों पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए शिकायत की। वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हुआ।

इसके बाद 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत की गई। महिला थाना रायपुर में 1 नवंबर 2021 को IPC की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज की गई।

शरिया संस्था के आदेश पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इदारा-ए-शरिया का आदेश किसी वैधानिक न्यायिक व्यवस्था के तहत जारी नहीं हुआ था। इसलिए इस आदेश के आधार पर न तो विवाह समाप्त हो सकता है और न ही किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, स्थिति या दायित्व में बदलाव किया जा सकता है।

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली संस्थाओं को कानून से स्थापित अदालत का दर्जा हासिल नहीं है। उनके फैसले बाध्यकारी नहीं होते और उन्हें कानूनी प्रक्रिया के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता।

तलाक-ए-हसन की वैधता पर फैसला नहीं

हाई कोर्ट ने इस मामले में तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता के सवाल पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का FIR या पक्षकारों के अन्य वैधानिक उपायों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 18 जनवरी 2022 के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के आदेश को कानूनी अधिकार से रहित घोषित कर दिया।

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