11 Mar 2026, Wed
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भारत में जन्म, नीदरलैंड में पहचान: डच शहर के मेयर बने फाल्गुन, 41 साल बाद मां की तलाश में पहुंचे भारत

नई दिल्ली, 15 जनवरी 2026। 10 फरवरी 1985… महाराष्ट्र के नागपुर में जन्मा एक नवजात, जिसे जन्म के महज तीन दिन बाद उसकी मां ने समाज के डर से छोड़ दिया। एक महीने तक वह बच्चा अनाथ आश्रम में रहा और फिर किस्मत उसे हजारों किलोमीटर दूर नीदरलैंड ले गई। आज, 41 साल बाद वही बच्चा नीदरलैंड के एक शहर का मेयर बन चुका है और अब अपनी असली मां की तलाश में भारत लौटा है।

इस प्रेरक कहानी के नायक हैं फाल्गुन बिनेनडिज्क, जो नीदरलैंड के हीमस्टेड शहर के मेयर हैं।

जन्म के तीन दिन बाद छोड़ा गया

आधिकारिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक, फाल्गुन की मां 21 वर्षीय अविवाहित युवती थीं। सामाजिक दबाव और लोकलाज के डर से उन्होंने अपने नवजात शिशु को नागपुर स्थित MSS (महिला सेवा सदन) में छोड़ दिया। MSS अनाथ बच्चों और संकटग्रस्त महिलाओं के लिए काम करने वाला संस्थान है।

नर्स ने दिया नाम ‘फाल्गुन’

MSS में काम करने वाली एक नर्स ने बच्चे को नाम दिया। चूंकि उसका जन्म फरवरी में हुआ था और हिंदू कैलेंडर में यह महीना फाल्गुन कहलाता है, इसलिए नर्स ने उसे फाल्गुन कहना शुरू कर दिया। कुछ हफ्तों बाद बच्चे को मुंबई लाया गया, जहां घूमने आए एक डच दंपती ने उसे गोद ले लिया और अपने साथ नीदरलैंड ले गए।

नीदरलैंड में परवरिश, भारत से अनजान बचपन

फाल्गुन का बचपन और शिक्षा पूरी तरह नीदरलैंड में हुई। लंबे समय तक उन्हें भारत के बारे में कुछ खास जानकारी नहीं थी। उन्होंने भारत को सिर्फ स्कूल की भूगोल की किताबों में बने नक्शे में देखा था। उम्र बढ़ने के साथ उनके मन में अपनी असली पहचान और मां को जानने की जिज्ञासा गहराती गई।

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18 साल की उम्र में पहली बार भारत आए

फाल्गुन 2006 में, 18 साल की उम्र में पहली बार भारत आए थे। तब उन्होंने दक्षिण भारत की यात्रा की थी। हालांकि, इस बार उनका मकसद बिल्कुल अलग है। हाल ही में वे नागपुर पहुंचे और MSS का दौरा किया, जहां से उनकी जिंदगी की कहानी शुरू हुई थी।

‘हर कर्ण को कुंती से मिलने का अधिकार’

फाल्गुन कहते हैं,
“मैं हमेशा से एक खुली किताब रहा हूं। मैंने महाभारत पढ़ी है और मुझे लगता है कि हर कर्ण को कुंती से मिलने का अधिकार है।”

मां से क्यों मिलना चाहते हैं फाल्गुन?

फाल्गुन वर्तमान में नीदरलैंड के हीमस्टेड शहर के मेयर हैं, जो राजधानी एम्स्टर्डम से करीब 30 किलोमीटर दूर है। उन्होंने अपनी मां को खोजने के लिए NGO, नगर पालिकाओं और पुलिस से मदद मांगी है।

फाल्गुन का कहना है,
“मुझे लगता है कि वह आज भी मुझे छोड़ने के सदमे में होंगी। मैं उनसे कोई शिकायत नहीं करना चाहता। बस उनसे मिलकर यह बताना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं, खुश हूं और जीवन में आगे बढ़ चुका हूं। एक बार उन्हें देखना चाहता हूं।”

एक अनाथ बच्चे से लेकर विदेशी धरती पर मेयर बनने तक का यह सफर आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद और इंसानियत की मिसाल बन गया है।

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By Desk

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