नई दिल्ली, 20 अगस्त 2026। भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ दो पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, बल्कि इनका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास पर पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंधों ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं, लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद दोनों देशों के सामने नई राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियां उभरी हैं।

भारत-बांग्लादेश संबंधों की नींव 1971 के मुक्ति संग्राम के दौर में पड़ी थी। हालांकि इसके बाद अवैध प्रवास, सीमा प्रबंधन, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और आतंकवाद जैसे मुद्दे दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करते रहे। वर्ष 2009 में शेख हसीना के सत्ता में लौटने के बाद भारत-बांग्लादेश सुरक्षा सहयोग में महत्वपूर्ण बदलाव आया। बांग्लादेश ने अपनी जमीन से भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों पर कार्रवाई की, जिससे पूर्वोत्तर में सुरक्षा स्थिति बेहतर हुई।
मोदी सरकार के कार्यकाल में रिश्तों को नई गति मिली। 2015 का भूमि सीमा समझौता इसका बड़ा उदाहरण रहा। इसके तहत दोनों देशों ने 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया। दशकों पुरानी इस समस्या का समाधान दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कदम माना गया।
कनेक्टिविटी बनी रिश्तों की नई धुरी
भारत और बांग्लादेश के बीच बढ़ती कनेक्टिविटी ने रिश्तों को रणनीतिक महत्व दिया है। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक का उद्घाटन हुआ। करीब 12.24 किलोमीटर लंबा यह रेल संपर्क भारत के पूर्वोत्तर को बांग्लादेश के रास्ते क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
बेहतर रेल, सड़क, जलमार्ग और बंदरगाह संपर्क से पूर्वोत्तर भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे माल ढुलाई का समय और लागत घटाने के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
सुरक्षा सहयोग भी अहम
बांग्लादेश लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अतीत में पूर्वोत्तर के कई उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया था। ढाका की कार्रवाई और भारत के साथ बढ़े सुरक्षा सहयोग के बाद इस चुनौती को काफी हद तक कमजोर किया गया।
यही वजह है कि भारत के लिए बांग्लादेश सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की स्थिरता का अहम सुरक्षा साझेदार भी है।
आर्थिक रिश्तों में भी बढ़ी नजदीकी
दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग भी पिछले डेढ़ दशक में तेजी से बढ़ा। भारत ने बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर रियायती ऋण उपलब्ध कराए। बिजली, रेल, सड़क, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं को एक-दूसरे के करीब लाया।
हालांकि 2024 के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलीं। शेख हसीना भारत आ गईं और बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण शुरू हुआ। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के बाद 2026 में चुनाव हुए और बीएनपी नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने। इसके साथ ही नई दिल्ली के सामने नई सरकार के साथ रिश्तों को नए सिरे से संतुलित करने की चुनौती है।
हसीना का मुद्दा बना संवेदनशील
शेख हसीना का भारत में रहना दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। बांग्लादेश ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की है। भारत ने कहा है कि इस अनुरोध पर कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत विचार किया जा रहा है। ऐसे में यह मुद्दा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।
राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में भारत के लिए टकराव के बजाय संतुलित कूटनीति सबसे बेहतर विकल्प है। सुरक्षा सहयोग को जारी रखते हुए व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को राजनीतिक बदलावों से अलग रखना होगा। साथ ही बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करना जरूरी होगा।
चीन के बढ़ते प्रभाव पर भी नजर
बांग्लादेश में चीन और अन्य बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के लिए केवल राजनीतिक बयानबाजी पर्याप्त नहीं होगी। भारत को आर्थिक सहयोग, कनेक्टिविटी और रणनीतिक साझेदारी के जरिए बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने होंगे।
आखिरकार बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। इसका सीधा संबंध पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार और विकास से है। ऐसे में ढाका में बदलती सरकारों के बीच नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह व्यक्ति-केंद्रित संबंधों से आगे बढ़कर भारत-बांग्लादेश रिश्तों को संस्थागत, दीर्घकालिक और राष्ट्रीय हित आधारित साझेदारी में बदल सके।





