5 Sep 2026, Sat
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ब्लैक बोर्ड से विधानसभा तक का सफर, शिक्षक बने विधायक-मंत्री: कोई CM बना तो किसी ने प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभाली, पढ़े पूरी खबर…

रायपुर, 05 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई ऐसे चेहरे हैं, जिनके राजनीतिक सफर की शुरुआत सियासत से नहीं, बल्कि क्लासरूम से हुई। कभी हाथ में चॉक और सामने बच्चों की क्लास होती थी। कोई सरकारी स्कूल में शिक्षक रहा तो किसी ने कॉलेज में लेक्चरर या प्रोफेसर के रूप में पढ़ाया। समय के साथ इन नेताओं ने शिक्षक की नौकरी छोड़ी और राजनीति का रास्ता चुना।

इसके बाद किसी ने विधायक बनकर पहचान बनाई, किसी ने मंत्री पद संभाला तो कोई मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पदों तक पहुंचा। शिक्षक दिवस के मौके पर जानिए ऐसे ही नेताओं की कहानी, जिनका सफर ब्लैक बोर्ड से विधानसभा तक पहुंचा।

रामविचार नेताम: सरकारी शिक्षक से मंत्री तक

बलरामपुर के सनावल क्षेत्र से आने वाले रामविचार नेताम ने राजनीति में आने से पहले शिक्षक के रूप में काम किया। वे रामचंद्रपुर ब्लॉक के चाकी गांव स्थित शासकीय प्राथमिक स्कूल में शिक्षक रहे।

 

 

गांव में बच्चों को पढ़ाने के साथ उनका सामाजिक जुड़ाव भी बढ़ता गया। धीरे-धीरे वे सामाजिक गतिविधियों से राजनीति की ओर आए। 1990 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया।

वे विधायक रहने के साथ राज्य और केंद्र की राजनीति में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री हैं।

विजय शर्मा: फिजिक्स की क्लास से डिप्टी CM तक

कवर्धा से आने वाले विजय शर्मा ने फिजिक्स में एमएससी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद 1996 से 1998 के बीच रायपुर के सेंट्रल कॉलेज, प्रगति कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के रूप में पढ़ाया।

छात्र जीवन से ही उनका जुड़ाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से रहा। संगठन में सक्रियता बढ़ने के साथ वे राजनीति में आगे बढ़े। 2023 में भाजपा ने उन्हें कवर्धा से विधानसभा चुनाव लड़ाया।

उन्होंने तत्कालीन मंत्री मोहम्मद अकबर को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली। यानी फिजिक्स पढ़ाने वाले शिक्षक का सफर डिप्टी CM की कुर्सी तक पहुंचा।

टंकराम वर्मा: सरकारी शिक्षक से कैबिनेट मंत्री

टंकराम वर्मा ने उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सरकारी शिक्षक के रूप में काम किया और शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए। नौकरी के दौरान ही उनका सामाजिक और राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया।

बाद में वे भाजपा से जुड़े और संगठन में काम किया। वरिष्ठ नेता रमेश बैस के साथ भी उन्होंने काम किया और मंत्री के निजी सहायक की जिम्मेदारी संभाली।

2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बलौदाबाजार से टिकट दिया। चुनाव जीतकर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और बाद में छत्तीसगढ़ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।

मोहन मरकाम: शिक्षाकर्मी से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मंत्री

मोहन मरकाम नियमित सरकारी शिक्षक के बजाय शिक्षाकर्मी वर्ग-1 और वर्ग-2 के रूप में शिक्षा विभाग से जुड़े रहे। छात्र जीवन से ही उनका राजनीतिक झुकाव था।

1990 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता लेने के बाद उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ा। 2008 में कोंडागांव से विधायक बने। इसके बाद 2019 में उन्हें छत्तीसगढ़ कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

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2023 में उन्हें भूपेश बघेल सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। इस तरह शिक्षाकर्मी से शुरू हुआ सफर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मंत्री पद तक पहुंचा।

डोमनलाल कोर्सेवाड़ा: 26 साल पढ़ाया, रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आए

डोमनलाल कोर्सेवाड़ा ने 1972 में सहायक शिक्षक के रूप में नौकरी शुरू की। उनकी पहली पोस्टिंग प्राथमिक शाला साजा, गुंडरदेही ब्लॉक में हुई।

1987 में वे उच्च श्रेणी शिक्षक बने और बाद में व्याख्याता के पद तक पहुंचे। करीब 26 साल शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के बाद 1998 में सेवानिवृत्त हुए।

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। भाजपा से जुड़े और 2023 में अहिवारा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने।

रामपुकार सिंह: शिक्षक की नौकरी से लंबी राजनीतिक पारी

पत्थलगांव की राजनीति के वरिष्ठ नेता रामपुकार सिंह भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक रहे। शिक्षक के रूप में करियर शुरू करने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए।

इसके बाद उन्होंने पत्थलगांव की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बनाई और कई बार विधायक बने। 2018 में उन्हें विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।

उनकी कहानी बताती है कि शिक्षक की नौकरी से मिला अनुशासन और लंबे समय तक लोगों के बीच काम करने का अनुभव राजनीति में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है।

चंद्रदेव राय: शिक्षाकर्मी आंदोलन से विधानसभा तक

चंद्रदेव राय ने 2003 में शिक्षाकर्मी के रूप में नौकरी शुरू की। अध्यापन के साथ वे शिक्षाकर्मी संगठन से जुड़े और कर्मचारी नेता के रूप में भी सक्रिय हुए।

शिक्षाकर्मियों की समस्याओं और अधिकारों की आवाज उठाते-उठाते उनका राजनीतिक जुड़ाव बढ़ा। 2018 में कांग्रेस के टिकट पर बिलाईगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने।

बाद में उन्हें संसदीय सचिव की जिम्मेदारी भी मिली। उनका राजनीतिक सफर शिक्षाकर्मी आंदोलन से विधानसभा तक पहुंचा।

सावित्री मंडावी: क्लासरूम से चुनावी मैदान तक

सावित्री मंडावी राजनीति में आने से पहले रायपुर के कटोरा तालाब स्थित सरकारी स्कूल में लेक्चरर थीं। पति मनोज मंडावी के निधन के बाद 2022 में भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।

उन्होंने शिक्षिका की नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में कदम रखा। कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया और उन्होंने चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया।

इस तरह एक शिक्षिका सीधे चुनावी मैदान में उतरी और पहली ही बड़ी राजनीतिक परीक्षा में जीत हासिल की।

चातुरी नंद: व्याख्याता की नौकरी छोड़ी, बनीं विधायक

सरायपाली विधायक चातुरी नंद राजनीति में आने से पहले शासकीय व्याख्याता थीं। सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना।

2023 में कांग्रेस ने उन्हें सरायपाली से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचीं।

विधायक बनने के बाद भी उनका शिक्षक से जुड़ाव बना रहा। 2024 में अपने बचपन के स्कूल पहुंचीं तो उन्होंने बच्चों को करीब 30 मिनट तक साइंस पढ़ाया।

विक्रम उसेंडी: शिक्षक से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तक

विक्रम उसेंडी ने राजनीति में आने से पहले शिक्षक के रूप में काम किया। इसके बाद भाजपा संगठन से जुड़े और सक्रिय राजनीति में आगे बढ़ते गए।

वे विधायक और लोकसभा सांसद रहे। संगठन में भी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं और वे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बने।

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उनका राजनीतिक सफर शिक्षक से शुरू होकर विधायक, सांसद और प्रदेश अध्यक्ष तक पहुंचा और अब वे फिर विधानसभा की राजनीति में सक्रिय हैं।

अजीत जोगी: शिक्षक से छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री तक

शिक्षक से राजनीति में आने वाले नेताओं में अजीत जोगी का नाम सबसे प्रमुख रहा। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन किया था। 1964-65 के दौरान वे वहां पढ़ाते थे।

इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया और आईएएस अधिकारी बने। आगे चलकर आईएएस की नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आए।

कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे, राज्यसभा सांसद रहे और पार्टी में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने।

उनकी पत्नी डॉ. रेणु जोगी भी शिक्षा क्षेत्र से राजनीति में आईं। राजनीति में आने से पहले वे मेडिकल कॉलेजों में नेत्र विभाग की प्रोफेसर थीं। बाद में कोटा से विधायक बनीं।

शिक्षक से नेता बने कई और चेहरे

छत्तीसगढ़ की राजनीति में शिक्षक से नेता बनने वालों की सूची काफी लंबी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने भी राजनीति में आने से पहले अध्यापन किया था। बाद में वे कांकेर से कई बार सांसद और विधायक रहे तथा केंद्र सरकार में मंत्री बने।

डॉ. शक्राजीत नायक कॉलेज में प्रोफेसर रहे और बाद में विधायक तथा मंत्री बने। नंदकुमार साय भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक रहे। वे भाजपा के बड़े आदिवासी नेताओं में शामिल हुए और कई बार सांसद रहे। बाद में कांग्रेस में शामिल होकर राज्य सरकार में भी जिम्मेदारी संभाली।

पूर्व विधायक देवलाल दुग्गा भी शिक्षक रहे। राजनीति में आने के बाद वे विधायक बने और अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।

सिद्धनाथ पैकरा भी शिक्षक से राजनीति में आए। वे सामरी विधानसभा सीट से विधायक रहे और रमन सिंह सरकार में संसदीय सचिव की जिम्मेदारी संभाली।

इसके अलावा झतिरूराम बघेल, राजाराम तोड़ेम, अंतूराम कश्यप, भुसरूराम नाग, अघन सिंह ठाकुर, मंतूराम पवार, संपत सिंह भंडारी और डॉ. रामलाल भारद्वाज जैसे कई नेताओं का जुड़ाव भी शिक्षक या अध्यापन के पेशे से रहा।

कृष्ण कुमार ध्रुव भी पहले शिक्षक थे। बाद में राजनीति में सक्रिय हुए और विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे।

ब्लैक बोर्ड से समाज की बड़ी जिम्मेदारी तक

इन नेताओं की राजनीतिक यात्राएं अलग-अलग दौर और परिस्थितियों में शुरू हुईं। किसी ने पंचायत स्तर से राजनीति की शुरुआत की, किसी ने विधानसभा का चुनाव लड़ा तो किसी ने लोकसभा और केंद्र सरकार तक का सफर तय किया।

लेकिन इन सभी की कहानी में एक समानता है—राजनीतिक जीवन की शुरुआत से पहले इनके हाथ में चॉक और सामने ब्लैक बोर्ड था।

शिक्षक दिवस पर इन नेताओं की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह सिर्फ शिक्षक से नेता बनने की कहानी नहीं है। यह उस सफर को दिखाती है, जिसमें एक शिक्षक पहले बच्चों का भविष्य संवारने की कोशिश करता है और बाद में पूरे समाज के लिए जिम्मेदारी उठाने की भूमिका में पहुंच जाता है।

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