11 सितंबर 1884 को मिली थी ‘काव्योपाध्याय’ की उपाधि, स्वर्ण बाजूबंद से हुआ था सम्मान; सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने 1890 में अंग्रेजी में प्रकाशित की थी उनकी कृति
रायपुर, 11 सितंबर 2026
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले काव्योपाध्याय हीरालाल को याद करते हुए रायपुर में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मूलवासी कलमकार संस्थान की ओर से भोला कुर्मी छात्रावास में आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों ने हीरालाल के योगदान पर चर्चा की।

धमतरी जिले के छोटे से गांव राखी में 1856 में जन्मे हीरालाल चन्नाहू ने छत्तीसगढ़ी भाषा के व्याकरण लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजकों के मुताबिक उन्होंने वर्ष 1885 में छत्तीसगढ़ी का व्याकरण लिखा। उनकी लेखनी और भाषाई योगदान को देखते हुए बंगाल के राजा सुरेंद्र मोहन टैगोर की संस्था ने 11 सितंबर 1884 को उन्हें ‘काव्योपाध्याय’ की उपाधि प्रदान की और स्वर्ण बाजूबंद से सम्मानित किया।


ग्रियर्सन ने भी माना था लेखनी का लोहा
काव्योपाध्याय हीरालाल की कृति का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि दुनिया के प्रसिद्ध भाषाशास्त्री सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने वर्ष 1890 में उनकी कृति को अंग्रेजी में प्रकाशित किया था। संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा को व्यवस्थित स्वरूप देने में हीरालाल का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम की शुरुआत काव्योपाध्याय हीरालाल के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इस दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संरक्षण, संवर्धन तथा हीरालाल के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विचार रखे गए।
संगोष्ठी में चंद्रशेखर चकोर, गोविंद धनगर, दास मनोहर, किसलाल कुर्रे, नारायण सिंह वर्मा, रमेश कुमार साहू, कमलेश कुमार धुर्वे, गणेश सोनकर, राजेन्द्र देवांगन, परमेश्वर कोसे, घनश्याम वर्मा, डॉ. अनिल भतपहरी, डॉ. नरेश साहू, रघुनंदन साहू, जयंत साहू और डॉ. पंचराम सोनी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।




