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पंडित लखनलाल मिश्र की जयंती पर विशेष : नौकरी, रौब और पद छोड़कर चुना आजादी का कठिन रास्ता, वर्दी पहनी थी अंग्रेजी हुकूमत की, लेकिन दिल था भारत माता के लिए धड़कता

रायपुर, 24 सितंबर 2026

कुछ लोग इतिहास में सिर्फ इसलिए याद नहीं किए जाते कि उन्होंने क्या पाया, बल्कि इसलिए याद किए जाते हैं कि देश के लिए उन्होंने क्या छोड़ दिया। पंडित लखनलाल मिश्र ऐसी ही शख्सियत थे।

24 सितंबर 1909 को जन्मे पंडित लखनलाल मिश्र छत्तीसगढ़ के उन स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं, जिनके जीवन में कर्तव्य, राष्ट्रप्रेम और त्याग का अद्भुत संगम दिखाई देता है। ब्रिटिश शासन में पुलिस दरोगा के पद पर रहते हुए भी उनका मन अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी से अधिक भारत की आजादी के लिए धड़कता था।

उनकी कहानी उस दौर की कहानी है, जब एक तरफ कंधे पर अंग्रेजी सरकार की वर्दी थी और दूसरी तरफ सीने में आजाद भारत का सपना।

जब वर्दी और राष्ट्रप्रेम आमने-सामने खड़े थे

पंडित लखनलाल मिश्र 1932 से ब्रिटिश प्रशासन में पुलिस दरोगा के पद पर कार्यरत थे। पद रौबदार था, अधिकार थे, जिम्मेदारियां थीं, लेकिन मन के भीतर एक सवाल लगातार उठता था –

“जब देश आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है, तब मैं किस तरफ खड़ा हूं?”

वे अंग्रेजी शासन का हिस्सा जरूर थे, लेकिन राष्ट्रवादी विचारों और गांधीजी के सिद्धांतों से प्रभावित थे। स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों की मदद भी करते थे।

उनके भीतर का द्वंद्व रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों में जैसे आवाज पाता था – 

“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”

यह सिर्फ कविता नहीं थी। यह उनके भीतर चल रहे संघर्ष की आवाज थी।

 

15 दिसंबर 1945… जब दुर्ग स्टेशन पर वर्दी ने इतिहास लिख दिया

पंडित लखनलाल मिश्र के जीवन का सबसे निर्णायक अध्याय आया 15 दिसंबर 1945 को। दुर्ग रेलवे स्टेशन पर तत्कालीन पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए उन्हें पुलिस टुकड़ी के साथ तैनात किया था। इसी दौरान पूर्व आईसीएस अधिकारी और राष्ट्रवादी विचारों से जुड़े आर.के. पाटिल के स्टेशन पर पहुंचने की खबर थी। अंग्रेजी शासन के दौर में माहौल संवेदनशील था। पुलिस की नजर हर गतिविधि पर थी। लेकिन ट्रेन के स्टेशन पर पहुंचते ही घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। पंडित लखनलाल मिश्र अपनी पुलिस टुकड़ी से अलग हुए। उन्होंने राष्ट्रवादी नेता आर.के. पाटिल को रौबदार पुलिस वर्दी में सैल्यूट किया।

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और फिर… गूंज उठा – 

“भारत माता की जय!”

“महात्मा गांधी की जय!”

जिस वर्दी को अंग्रेजी सत्ता की ताकत माना जाता था, उसी वर्दी में खड़े एक भारतीय दरोगा ने राष्ट्रभक्ति का उद्घोष कर दिया।

यह सिर्फ नारा नहीं था। यह वर्षों से भीतर पल रहे द्वंद्व का अंत था।

एक क्षण… और छोड़ दी अंग्रेजों की नौकरी

उस ऐतिहासिक घटना के बाद पंडित लखनलाल मिश्र ने ब्रिटिश पुलिस की नौकरी छोड़ दी । यह फैसला आसान नहीं था। पीछे परिवार था। सामने अनिश्चित भविष्य था। एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी, दूसरी तरफ स्वतंत्रता संग्राम का कठिन रास्ता। लेकिन उन्होंने सुविधा नहीं, स्वाभिमान चुना। उन्होंने अपने गृह ग्राम मुरा लौटकर राष्ट्रीय चेतना जागरण का कार्य शुरू किया और समाज के लोगों, युवाओं और विद्यार्थियों को देश की आजादी के लिए जागरूक किया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज की चेतना का जागरण भी है।

“परमवीर अहिंसा” बना जीवन का मार्ग

पंडित लखनलाल मिश्र महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों में विश्वास रखते थे। लेकिन उनके लिए अहिंसा का अर्थ कमजोरी नहीं था। उन्होंने “परमवीर अहिंसा” का मार्ग अपनाया – ऐसी अहिंसा जिसमें साहस भी था, त्याग भी और राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने का संकल्प भी।

तुलसीदास, कबीर और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं से प्रभावित पंडित मिश्र साहित्य और कविता के माध्यम से भी सामाजिक चेतना जगाने का प्रयास करते रहे।

 

उनका जीवन मानो यही कहता रहा –

“देश के लिए बड़ा काम करने के लिए हमेशा बड़ा पद जरूरी नहीं होता, बड़ा हृदय और बड़ा संकल्प जरूरी होता है।”

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आजादी के बाद भी पद और सम्मान से रहे दूर

देश आजाद हुआ। अंग्रेज चले गए। सत्ता बदली। लेकिन पंडित लखनलाल मिश्र के लिए राष्ट्रसेवा किसी पद या पुरस्कार की सीढ़ी नहीं थी। मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्य विजिलेंस प्रमुख का दायित्व देने की इच्छा जताई थी। लेकिन उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

उनका तर्क स्पष्ट था – 

मां भारती के लिए किए गए कर्तव्य का कोई मोल नहीं लगाया जा सकता।

यानी जिस व्यक्ति ने आजादी के लिए नौकरी छोड़ी थी, उसने आजादी के बाद भी अपने त्याग की कीमत नहीं मांगी।

मुरा की मिट्टी में विलीन हुआ एक राष्ट्रभक्त

16 मार्च 1984 को पंडित लखनलाल मिश्र ने अपनी जन्मभूमि मुरा में अंतिम सांस ली। लेकिन कुछ जीवन मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते।

वे विचार बन जाते हैं।

वे प्रेरणा बन जाते हैं।

वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सवाल बन जाते हैं –

जब देश को आपकी जरूरत हो, तब आप किस तरफ खड़े होंगे?

पंडित लखनलाल मिश्र का जीवन इसी सवाल का उत्तर है।

इतिहास की वह तस्वीर आज भी बोलती है

एक तरफ अंग्रेजी शासन की पुलिस वर्दी…दूसरी तरफ भारत माता के जयकारे… और इनके बीच खड़ा एक ऐसा भारतीय, जिसने तय कर लिया कि अब उसकी निष्ठा किसी पद या सत्ता से नहीं, बल्कि मातृभूमि से होगी। पंडित लखनलाल मिश्र की गाथा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने सिर्फ आजादी का सपना नहीं देखा – उन्होंने उस सपने की कीमत चुकाई।

उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों से जैसे कहता है – 

“पद आएंगे, पद जाएंगे,

सत्ता बदलेगी, समय बदलेगा…

लेकिन राष्ट्र के लिए किया गया त्याग

इतिहास के पन्नों से कभी मिटता नहीं।”

 

 

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