नई दिल्ली, 13 अगस्त 2025
भारत की सबसे बड़ी एल्युमीनियम उत्पादक कंपनी वेदांता एल्युमीनियम ने भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (सीईटीए) पर हस्ताक्षर का स्वागत करते हुए इसे भारतीय एल्युमीनियम उद्योग के लिए परिवर्तनकारी अवसर बताया है।

वेदांता एल्युमीनियम के सीईओ राजीव कुमार और बाल्को (वेदांता समूह की कंपनी) के सीईओ राजेश कुमार ने खान मंत्रालय द्वारा आयोजित वेबिनार में एल्युमीनियम एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAI) का प्रतिनिधित्व किया। यह वेबिनार “भारत-यूके सीईटीए और भारतीय खनिज क्षेत्र को लाभ” विषय पर आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता खान मंत्रालय के सचिव वी.एल. कांथा राव ने की। इसमें एएआई, फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज (FIMI), एल्युमीनियम सेकेंडरी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ASMA) और मैटेरियल रिसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MRAI) समेत कई उद्योग निकायों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
सीईटीए के तहत भारत ब्रिटेन के 90% उत्पादों पर टैरिफ में कटौती करेगा, जबकि ब्रिटेन भारत के 99% निर्यात पर शुल्क में छूट देगा। इससे व्यापार बाधाएं घटेंगी, नए निर्यात अवसर पैदा होंगे और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 56 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
कांथा राव ने कहा कि सरकार ब्रिटेन में एल्युमीनियम बिक्री बढ़ाने के लिए भारतीय दूतावास के साथ रोड शो आयोजित करेगी, जिससे उद्योग और सरकार का सहयोग मजबूत होगा।
राजीव कुमार ने बताया कि भारत सालाना 4.2 एमटीपीए प्राथमिक एल्युमीनियम का उत्पादन करता है और 1.6 एमटीपीए अपस्ट्रीम एल्युमीनियम का निर्यात करता है, जबकि ब्रिटेन में कोई प्राथमिक उत्पादन नहीं है और वहां बड़ी मात्रा में आयात की जरूरत है। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास सहयोग और उत्पाद प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए सीईटीए का लाभ उठाने पर जोर दिया।
उन्होंने चेताया कि जनवरी 2027 में लागू होने वाला कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भारत के निर्यात के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि स्कोप-2 उत्सर्जन के चलते शुल्क प्रभाव 80% से अधिक हो सकता है, जिससे 0% ड्यूटी मार्केट एक्सेस का लाभ खत्म हो सकता है।
राजीव कुमार ने कहा—
“भारत-यूके सीईटीए भारतीय एल्युमीनियम क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम है। ऊर्जा परिवर्तन के साथ 2040 तक एल्युमीनियम की मांग में 37% तक वृद्धि होगी, जो इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और पारेषण इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों से संचालित होगी। ब्रिटेन में उत्पादन की कमी के चलते भारतीय निर्माता यहां प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन सकते हैं।”





