प्रमोद मिश्रा
रायपुर/सरगुजा, 02 सितंबर 2025

हसदेव अरण्य क्षेत्र में केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मिली वन विभाग की अनुज्ञा को लेकर सियासत तेज हो गई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को 6 पन्नों का विस्तृत पत्र भेजते हुए खदान की स्वीकृति को गंभीर त्रुटि और सरगुजा की धार्मिक, सांस्कृतिक व पर्यावरणीय धरोहर के लिए खतरा करार दिया है।
सिंहदेव ने आरोप लगाया कि सरगुजा डीएफओ द्वारा तैयार 10 पॉइंट के स्थल प्रतिवेदन में कई तथ्यों को छिपाया गया है। उन्होंने कहा कि रामगढ़ पर्वत भगवान श्रीराम के वनवास काल से जुड़ा है और यहां संरक्षित धरोहर सीता बेंगरा, जोगीमारा गुफा और विश्व की प्राचीन नाट्यशाला स्थित है। वर्तमान में संचालित पीकेईबी खदान में विस्फोटों से रामगढ़ पहाड़ी दरक रही है।
DFO पर गलत रिपोर्ट का आरोप
सिंहदेव ने कहा कि डीएफओ ने केते एक्सटेंशन खदान के लिए फॉरेस्ट डायवर्सन की अनापत्ति गलत रिपोर्ट के आधार पर दी है। प्रतिवेदन में रामगढ़ से दूरी 11 किमी बताई गई है, जबकि वास्तविक दूरी 8.1 से 9.5 किमी के बीच है। इसमें रामगढ़ के प्राचीन राम मंदिर का उल्लेख तक नहीं है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित घोषित किया है।
4.5 लाख पेड़ कटने का खतरा
पत्र में बताया गया है कि खदान के कुल 1742 हेक्टेयर क्षेत्र में 99% घना जंगल है। यहां खदान स्वीकृत होने पर करीब 4.5 लाख पेड़ कट जाएंगे। सिंहदेव ने कहा कि डीएफओ ने लेमरू हाथी अभ्यारण का उल्लेख भी नहीं किया है, जबकि यह 10 किमी परिधि में आता है।
“नो गो एरिया” में खनन का विरोध
सिंहदेव ने कहा कि वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने पूरे हसदेव अरण्य को NGT के आदेशानुसार “नो गो एरिया” घोषित किया है। ऐसे में यहां खदान की स्वीकृति पर्यावरणीय नियमों के खिलाफ है।
नए खदान की जरूरत नहीं
उन्होंने तर्क दिया कि परसा कोयला खदान से राजस्थान के 4350 मेगावाट संयंत्र के लिए अगले 20 साल तक पर्याप्त कोयला उपलब्ध है। इसलिए नई खदान खोलने की कोई जरूरत नहीं है।
विधानसभा का संकल्प याद दिलाया
सिंहदेव ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ विधानसभा पहले ही इस खदान का विरोध कर संकल्प पारित कर चुकी है, जिसका समर्थन भाजपा विधायकों ने भी किया था। उन्होंने मांग की कि सरकार निर्णायक पहल कर रामगढ़ पर्वत और सरगुजा के पर्यावरण को बचाने का निर्णय ले।





