रायपुर, 20 नवंबर 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर सामाजिक कार्यकर्ता योगेश साहू ने धरती आबा बिरसा मुंडा पर एक भावनात्मक और प्रेरणादायी लेख लिखा, जो जनजातीय समाज की आत्मा और अस्मिता को नई ऊर्जा देता है।
योगेश साहू ने कहा कि जंगल में दो ही राजा होते हैं—एक टाइगर और दूसरा ट्राइबल। जंगल की यही धड़कन बिरसा मुंडा की चेतना में बसती थी। वह सिर्फ क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक जीवंत दर्शन थे, जो धरती, जंगल और प्रकृति को माँ का रूप मानता था।
उन्होंने बताया कि संघ ने बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। यह कोई राजनीति नहीं, बल्कि जनजातीय समाज और संस्कृति के प्रति समर्पण का भाव है।
योगेश साहू लिखते हैं कि जब अंग्रेज और जमींदार जनजातीय जमीन छीन रहे थे, धर्म परिवर्तन का दबाव बढ़ रहा था, तब मात्र 25 वर्ष का एक युवा खड़ा होकर बोला —
“अबुआ दिशुम, अबुआ राज”
यही आवाज महाउलगुलान का स्वर बन गई।
उन्होंने कहा कि 1899–1900 के विद्रोह ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया था। बांस के भाले और तीर-कमान के साथ भी जनजातीय समाज ने दिखा दिया कि जंगल माँ है और उसकी रक्षा प्राण देकर भी की जाएगी। बिरसा को जेल में जहर देकर मार दिया गया, पर उनकी चेतना आज भी सरना के साल वृक्षों में गूंजती है।
योगेश साहू ने आधुनिक दुनिया के “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” की चर्चा करते हुए कहा कि आदिवासी समाज सदियों से इसे जी रहा है। चाहे त्योहार हों—सोहराय, करम, सरहुल, या रोजमर्रा का जीवन—सब कुछ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है।
वे कहते हैं कि वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता आज भी उन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं जहाँ बिरसा ने विद्रोह की ज्वाला जलाई थी। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
लेख में यह भी संदेश दिया गया है कि बिरसा आज होते तो यही कहते—
“अपनी भाषा, अपना परिधान, अपना सरना कभी मत छोड़ो। शिक्षा लो, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं।”
आज जब दुनिया भर में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जा रहा है, यह स्वयं बिरसा मुंडा की जीत है—उस नौजवान की, जिसने 25 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य को चुनौती दी थी।
अंत में योगेश साहू ने कहा—
जय बिरसा! जय जनजातीय भारत! जय हिंद!
धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रेरणा आज भी हर आदिवासी बच्चे की साँस में जीवित है।





