प्रमोद कुमार
रायपुर, 17 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत फोर्टिफाइड चावल के लिए खरीदे जाने वाले फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) का टेंडर अब बड़े विवाद की वजह बन गया है। राज्य विपणन संघ (मार्कफेड) द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए जारी टेंडर में अचानक और एकतरफा शर्तों में बदलाव किए जाने से प्रदेश के करीब 80 प्रतिशत स्थानीय FRK उत्पादक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गए हैं।

अब तक लगभग 39 रुपए प्रति किलो की दर से खरीदे जाने वाले FRK की कीमत नए टेंडर में 60 रुपए प्रति किलो तक पहुंचने की आशंका है। जानकारों का कहना है कि इससे सरकारी खजाने पर सालाना 175 से 200 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
मार्कफेड इस वर्ष लगभग 84 हजार मीट्रिक टन FRK की खरीदी करने जा रहा है। लेकिन नए टेंडर में ऐसी शर्तें जोड़ी गई हैं, जिनके चलते छोटे और मध्यम स्थानीय उद्योग अयोग्य घोषित हो गए, जबकि केवल 20 प्रतिशत बड़े और बाहरी राज्यों के मिलर्स ही टेंडर में शामिल हो पाए हैं।
राइस मिलर्स का आरोप है कि यह बदलाव कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया, जिससे छत्तीसगढ़ के स्थानीय उद्यमियों को सीधा नुकसान हुआ है।
राइस मिलर्स और FRK उत्पादकों का कहना है कि यह फैसला
- छत्तीसगढ़ भंडार क्रय अधिनियम की भावना के खिलाफ है
- स्थानीय उद्योगों को खत्म करने की साजिश जैसा है
- टेंडर शर्तों में बड़े बदलाव के लिए कम से कम 15 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए था, जो नहीं दिया गया
1. क्या 20% मिलर्स पूरी सप्लाई कर पाएंगे?
पूरे प्रदेश की 84 हजार मीट्रिक टन FRK जरूरत क्या केवल चुनिंदा मिलर्स समय पर पूरी कर पाएंगे? आपूर्ति बाधित होने का खतरा भी बढ़ गया है।
2. भुगतान व्यवस्था से मिलर्स पर दबाव
नई शर्तों के तहत मिलर्स को 60 रुपए किलो की दर से FRK खरीदकर तुरंत भुगतान करना होगा, जबकि सरकार से भुगतान 1 से 2 साल बाद मिलेगा। इससे छोटे और मध्यम मिलर्स आर्थिक रूप से टूट सकते हैं।
3. सस्ती उपलब्धता के बावजूद महंगी खरीदी क्यों?
जब बाजार में FRK 39 रुपए किलो में उपलब्ध है, तो 60 रुपए किलो की दर से खरीदी को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है?
175–200 करोड़ के अतिरिक्त बोझ की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यह विवाद अब सिर्फ टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि
- प्रदेश की औद्योगिक नीति
- स्थानीय उद्यमिता के संरक्षण
- सरकारी धन के विवेकपूर्ण उपयोग
जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ गया है। उद्योग जगत की मांग है कि सरकार तत्काल हस्तक्षेप कर टेंडर शर्तों की समीक्षा करे, ताकि स्थानीय उद्योगों को बचाया जा सके और सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ न पड़े।





