6 Jun 2026, Sat
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बस्तर के जंगलों से राष्ट्रपति भवन तक: ‘बड़ी दीदी’ और गोडबोले दंपत्ति को मिलेगा पद्म श्री, कल देश करेगा सलाम

सतीश शर्मा

रायपुर, 24 मई 2026

भारतीय गणराज्य की गौरवशाली परंपरा में आज एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के भव्य दरबार हॉल में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह में भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu देश के उन अनमोल समाजसेवियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित करेंगी, जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार के समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के जीवन को बदलने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

 

 

इस वर्ष का समारोह छत्तीसगढ़ और विशेष रूप से बस्तर अंचल के लिए गौरव का क्षण बनने जा रहा है। दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ के दुर्गम वनांचलों में दशकों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक जागरूकता की अलख जगाने वाली डॉ. बुधरी ताती, जिन्हें पूरा बस्तर ‘बड़ी दीदी’ के नाम से जानता है, तथा आदिवासी क्षेत्रों में चिकित्सा और सामाजिक सेवा को समर्पित गोडबोले दंपत्ति—डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले—को पद्म श्री सम्मान से अलंकृत किया जाएगा।

500 से अधिक गांवों तक पैदल पहुंचीं ‘बड़ी दीदी’

दक्षिण बस्तर के हीरानार गांव से निकलकर समाजसेवा का व्रत लेने वाली डॉ. बुधरी ताती ने वर्ष 1984 से बस्तर के घने जंगलों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम शुरू किया। उस समय इन इलाकों में न सड़कें थीं, न संचार व्यवस्था और न ही शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं।

‘बड़ी दीदी’ ने सैकड़ों गांवों तक पैदल पहुंचकर आदिवासी परिवारों को शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक किया। उन्होंने माता-पिता को समझाया कि शिक्षा ही बच्चों का भविष्य बदल सकती है। उनके प्रयासों से अनेक आदिवासी बेटियां पढ़-लिखकर आज नर्स और स्वास्थ्यकर्मी के रूप में सेवाएं दे रही हैं।

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उन्होंने महिलाओं के लिए सिलाई-कढ़ाई और हस्तशिल्प प्रशिक्षण शुरू कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह भी खोली। साथ ही शराबखोरी, घरेलू हिंसा और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया।

कुपोषण और स्वास्थ्य संकट से लड़े गोडबोले दंपत्ति

डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले ने अपना जीवन बस्तर और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में चिकित्सा सेवा के लिए समर्पित कर दिया। जब दुर्गम और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाने से लोग कतराते थे, तब गोडबोले दंपत्ति ने वहीं अपनी कर्मभूमि बनाई।

उन्होंने आदिवासी बच्चों में कुपोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं को लेकर लगातार काम किया। गांव-गांव स्वास्थ्य शिविर लगाए गए, स्थानीय युवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण दिया गया और आदिवासी समाज को आधुनिक चिकित्सा पद्धति से जोड़ने का प्रयास किया गया।

गोडबोले दंपत्ति की सेवाएं केवल इलाज तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक उत्थान को भी अपने कार्य का हिस्सा बनाया। यही कारण है कि आज भी बस्तर के अनेक गांवों में लोग उन्हें सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करते हैं।

‘पीपल्स पद्म’ की नई पहचान

हाल के वर्षों में पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब ये सम्मान केवल बड़े शहरों या चर्चित हस्तियों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि समाज के उन गुमनाम नायकों तक पहुंच रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक चुपचाप सेवा की।

अब कोई भी नागरिक ऑनलाइन माध्यम से किसी समाजसेवी या गुमनाम नायक का नामांकन कर सकता है। चयन प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव या प्रसिद्धि के बजाय जमीनी काम और सामाजिक प्रभाव को प्राथमिकता दी जा रही है।

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इस वर्ष घोषित 131 पद्म पुरस्कारों में 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं। इनमें देश के दूरस्थ इलाकों में काम करने वाले अनेक समाजसेवियों को स्थान मिला है।

राष्ट्रपति के हाथों सम्मान का विशेष महत्व

राष्ट्रपति Droupadi Murmu स्वयं जनजातीय पृष्ठभूमि से आती हैं और उन्होंने संघर्षों को करीब से देखा है। ऐसे में उनके हाथों बस्तर के वनांचलों में कार्य करने वाले इन समाजसेवियों को सम्मान मिलना और भी अधिक प्रेरणादायक माना जा रहा है।

आज राष्ट्रपति भवन में होने वाला यह सम्मान समारोह केवल पुरस्कार वितरण नहीं होगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि देश अब बस्तर को केवल संघर्ष और नक्सल हिंसा की नजर से नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और सामाजिक परिवर्तन की भूमि के रूप में भी पहचान रहा है।

डॉ. बुधरी ताती और गोडबोले दंपत्ति का सम्मान नई पीढ़ी के लिए यह प्रेरणा बनेगा कि सच्ची सेवा और निस्वार्थ समर्पण कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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By Desk

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