रायपुर, 29 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल अबूझमाड़ की पारंपरिक कृषि और वन उपज को अब राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। नारायणपुर जिले के तीन विशिष्ट उत्पाद—पीला कोसरा (आर्क), काला कोसरा और तिखुर—को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिलाने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है। इससे पहली बार अबूझमाड़ की सदियों पुरानी जनजातीय कृषि विरासत को वैश्विक मंच पर पहचान मिलने का रास्ता खुलेगा।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) के वैज्ञानिकों ने ओरछा विकासखंड के कच्चापाल और कुतुल गांवों का दौरा कर इन पारंपरिक फसलों और वन उत्पादों का विस्तृत अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने इनके जैविक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पोषण संबंधी गुणों का दस्तावेजीकरण किया तथा स्थानीय किसानों से पारंपरिक खेती, बीज संरक्षण और उत्पादन पद्धतियों की जानकारी जुटाई।
अध्ययन में सामने आया कि अबूझमाड़ के आदिवासी समुदाय के दैनिक भोजन का हिस्सा रहे पीला और काला कोसरा कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले पौष्टिक मिलेट हैं, जो मधुमेह रोगियों के लिए लाभकारी हो सकते हैं। वहीं तिखुर, जो हल्दी परिवार का प्राकृतिक कंद है, गर्मियों में शरीर को ठंडक देने और व्रत के खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग किया जाता है। इन उत्पादों के औषधीय और पोषण संबंधी गुणों की प्रयोगशाला में विस्तृत जांच भी जारी है।
जिला प्रशासन की पहल पर शुरू हुई GI टैगिंग प्रक्रिया से इन उत्पादों को बेहतर बाजार, अधिक मूल्य और ब्रांड पहचान मिलने की संभावना है। इससे अबूझमाड़ के किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ पारंपरिक जैविक खेती और जनजातीय ज्ञान का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।
आईजीकेवी के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने बताया कि प्रारंभिक लैब परीक्षणों के संकेत उत्साहजनक हैं। उनका कहना है कि GI टैग मिलने से इन पारंपरिक फसलों का बौद्धिक अधिकार सुरक्षित होगा, अनुसंधान के नए अवसर खुलेंगे और जनजातीय परिवारों को उनकी सदियों पुरानी कृषि परंपरा का स्थायी आर्थिक लाभ मिल सकेगा।





