नई दिल्ली, 15 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। मामला हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले एक व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) के तहत आरक्षण का लाभ देने से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार दिया था, जिसके तहत कुछ पिछड़े वर्गों से इस्लाम में धर्मांतरण करने वाले लोगों को मुस्लिम आरक्षण श्रेणी में शामिल करने का प्रावधान किया गया था।
इस मामले में अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या केवल धर्म परिवर्तन करने से किसी व्यक्ति को नए धर्म के पिछड़े वर्ग की श्रेणी में शामिल होने और आरक्षण का लाभ लेने का अधिकार मिल जाता है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के एक व्यक्ति से संबंधित है, जिसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था। खबर के अनुसार, उसने वर्ष 2016 में इस्लामी रीति-रिवाज से निकाह करने के बाद इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम समीर अहमद रख लिया। इससे पहले, वर्ष 2015 में कायाथार की सुन्नत जमात ने उसे धर्म परिवर्तन का प्रमाण पत्र जारी किया था।

इसके बाद उसने खुद को मुस्लिम लेब्बई समुदाय का सदस्य बताते हुए सामुदायिक प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया। हालांकि, स्थानीय तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद उसने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लेने से किसी व्यक्ति को स्वतः पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) का दर्जा नहीं मिल जाता।
अदालत ने तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2024 के उस सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार दिया था, जिसमें कुछ विशेष पिछड़े वर्गों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को मुस्लिम आरक्षण श्रेणी के तहत लाभ देने का प्रावधान था।
आरक्षण के लिए पात्रता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखे जाने के बाद धर्मांतरण और आरक्षण की पात्रता से जुड़े इस मामले में कानूनी स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इस मामले का मूल मुद्दा यह है कि धर्म परिवर्तन मात्र से किसी व्यक्ति को किसी अन्य समुदाय की आरक्षण श्रेणी का लाभ स्वतः नहीं मिल जाता।
नोट: यह खबर उपलब्ध समाचार सामग्री के आधार पर तैयार की गई है। फैसले के सटीक कानूनी दायरे और लागू आरक्षण नियमों की पुष्टि के लिए सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक आदेश का संदर्भ लिया जाना चाहिए।


