धनंजय राठौर
संयुक्त संचालक, जनसंपर्क रायपुर

पर्यटन एक ऐसी यात्रा या भ्रमण है, जो मनोरंजन या फुर्सत के क्षणों का आनंद उठाने के उद्देश्य से किया जाता है। अतिथि देवो भवः भारतीय परंपरा प्राचीन काल से रही है। छत्तीसगढ़ में लगभग 138 स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के आधार पर पर्यटन स्थल के रूप में प्राथमिकता दी गई है, जिसमें 58 स्मारकों, 11 अभ्यारण्यों और 03 राष्ट्रीय उद्यानों को संरक्षित घोषित किया गया है। पर्यटन मानव की प्राचीन एवं मौलिक प्रवृत्ति है। पर्यटन धरातलीय तथा मानवीय विभिन्नताओं और विविधताओं का अवलोकन कर ज्ञान की बढ़ोतरी एवं मनोरंजन करता है। छत्तीसगढ़ प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यटन का एक प्रमुख गंतव्य है। यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक धरोहर ने इसे एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तराखंड के चार धाम की तर्ज पर राज्य के प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़ने के लिए शक्तिपीठ परियोजना की शुरुआत की है। इस परियोजना के तहत लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे आध्यात्मिक और धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर का विकास किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों एवं महत्वपूर्ण पूजा स्थलों का विकास, सौंदर्यीकरण तथा आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। शक्तिपीठों में श्रद्धालुओं के लिए सुगम पहुंच मार्ग, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छता, विश्राम स्थल एवं सुरक्षा व्यवस्था जैसी आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
छत्तीसगढ़ आस्था पथ (शक्तिपीठ भ्रमण) योजना प्रारंभ की जा रही है, जिसमें पांचों शक्तिपीठों का भ्रमण एवं दर्शन कराया जाएगा। इसके लिए सरकार ने वर्ष 2026-27 के बजट में 5 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। प्रदेश के पांच शक्तिपीठों—कुदरगढ़, डोंगरगढ़, रतनपुर, चंद्रपुर एवं दंतेवाड़ा—को शक्तिपीठ सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए बजटीय प्रावधान किया गया है। इस परियोजना के तहत रतनपुर स्थित मां महामाया, चंद्रपुर की मां चंद्रहासिनी, डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा की मां दंतेश्वरी और सूरजपुर के कुदरगढ़ मंदिर को एक धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित किया जाना है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सरकार गठन के बाद बजट में इसके लिए पांच करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, जिससे प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। इन पांचों शक्तिपीठों को बेहतर सड़कों, यात्री सुविधाओं, विश्राम स्थलों और सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ा जाएगा। छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल और जिला प्रशासन द्वारा इन मंदिरों में सौंदर्यीकरण तथा श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार के लिए काम किया जा रहा है।
केंद्र सरकार की प्रसाद (PRASHAD) योजना के तहत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले स्थित मां महामाया मंदिर, रतनपुर के समग्र विकास के लिए 200 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसे केंद्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय को प्रेषित किया गया है। उक्त कार्ययोजना को स्वीकृति मिलते ही एजेंसी तय कर कार्य प्रारंभ किया जाएगा। यह मंदिर 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा बनवाया गया था और यह मां महालक्ष्मी एवं मां महासरस्वती को समर्पित है। यह दक्षिण कोशल क्षेत्र की आराध्य देवी और रतनपुर राज्य की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। इसके अलावा डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा के शक्तिपीठों के लिए सीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है।
प्रसाद योजना के तहत केंद्र सरकार ने प्रथम चरण में देश के 26 धार्मिक तीर्थ स्थलों का चयन किया है। इन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा रहा है, ताकि देश-विदेश के पर्यटक यहां पहुंच सकें। इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और इन स्थलों की प्रसिद्धि का विस्तार होगा। हमारे प्रमुख देवी तीर्थस्थल महामाया मंदिर और दंतेश्वरी मंदिर को प्रसाद योजना में शामिल करवाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा गया है।
यह सुविधाएं की जानी हैं विकसित
पांचों शक्तिपीठों में गार्डन, ठहरने की व्यवस्था, लाइटिंग, हवन-पूजन स्थल, रेलिंग, पानी, सामुदायिक शौचालय, बैठने की व्यवस्था, रोप-वे, पर्यटन मंडल का केंद्र, सीसीटीवी कैमरे, सुरक्षा व्यवस्था और होम स्टे जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं। इन स्थलों में बेहतर सड़क संपर्क, स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय, सुव्यवस्थित पार्किंग, पर्यटक सहायता केंद्र, डिजिटल सूचना प्रणाली, प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षा जैसी आवश्यक सुविधाओं को प्राथमिकता के साथ विकसित किया जाएगा। इन पर्यटन स्थलों की विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए उनके विकास में स्थानीय वास्तुकला, संस्कृति और प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण का भी विशेष ध्यान रखा जाएगा।
1. मां बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित डोंगरगढ़ की सुरम्य पहाड़ियों की गोद में विराजी मां बम्लेश्वरी देवी इस क्षेत्र ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। समुद्र तल से लगभग 1,600 फीट की ऊंचाई पर पहाड़ी पर स्थित यह पवित्र मंदिर मां शक्ति के पावन रूपों में विशेष स्थान रखता है।
छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास लगभग 2,200 वर्ष पुराना बताया जाता है। यह एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। मान्यता के अनुसार, लगभग 2,200 वर्ष पहले यहां कामाख्या नगरी (वर्तमान डोंगरगढ़) थी, जहां राजा वीरसेन का शासन था। निःसंतान होने पर उन्होंने शिव और दुर्गा की आराधना की। देवी की कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद उन्होंने इस मंदिर की स्थापना करवाई।
11वीं शताब्दी में कलचुरी राजा कर्णदेव ने इस मंदिर का पुनर्विकास किया। बाद में 15वीं-16वीं शताब्दी में गोंड राजाओं ने इस क्षेत्र और मंदिर का विस्तार किया। मां बम्लेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। मां बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास 2,500 वर्ष से भी प्राचीन बताया जाता है। केंद्र सरकार ने यहां प्रसाद योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर की परियोजना की घोषणा की है।
2. मां महामाया मंदिर, रतनपुर
रतनपुर महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक सिद्ध शक्तिपीठ है। बिलासपुर-कोरबा मार्ग पर स्थित महामाया देवी का यह मंदिर 1050 ईस्वी में बना बताया जाता है। राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा स्थापित इस मंदिर क्षेत्र को कलचुरियों की राजधानी माना जाता है। यह कलचुरी राजाओं की कुलदेवी का ऐतिहासिक मंदिर है, जहां माता का कंधा गिरने की मान्यता है।
इस मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी में कलचुरी वंश के राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा कराया गया था। बाद में 1492 ईस्वी (विक्रम संवत 1552) में राजा बहार साईं ने वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार एवं निर्माण कराया। गर्भगृह में मां महामाया की दुर्लभ दोहरी प्रतिमा है। आगे महिषासुरमर्दिनी और पीछे देवी सरस्वती की आकृति विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना हाथ गिरा था।
3. मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय परंपरा और सनातन आस्था के अद्भुत मिलन का प्रमुख प्रतीक है। यह मंदिर दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम तट पर स्थित है, जो सदियों से आदिवासियों और आम लोगों की अगाध श्रद्धा का केंद्र रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां माता सती के दांत गिरे थे, जिसके कारण इस पावन स्थल का नाम दंतेवाड़ा और माता का नाम दंतेश्वरी पड़ा। 14वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की अधिष्ठात्री देवी को बस्तर के काकतीय राजा अपनी कुलदेवी मानते थे। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से निर्मित छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की भव्य मूर्ति स्थापित है।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान इस मंदिर का महत्व अपने चरम पर होता है। उत्सव के दौरान माता के छत्र और डोली को दंतेवाड़ा से जगदलपुर ले जाया जाता है। इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से हजारों आदिवासी और अन्य श्रद्धालु पैदल पहुंचते हैं। यह आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक एकता और आपसी भाईचारे को दर्शाता है।
4. मां बागेश्वरी, कुदरगढ़ धाम
सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड स्थित बागेश्वरी माता को राक्षसों के संहार के लिए जाना जाता है। यह शक्ति एवं साहस का प्रतीक मानी जाती हैं। लगभग 1,500 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित यह मंदिर चारों ओर घने जंगलों से घिरा है।
मान्यता के अनुसार, कुदरगढ़ क्षेत्र मां भगवती पार्वती की तपोस्थली रहा है, जहां माता भगवती ने शक्ति का रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया था। बाद में इसी जगह पर लगभग चार सौ साल पहले राजा बालंद ने माता बागेश्वरी की प्रतिमा स्थापित की थी। वे माता के भक्त थे। बाद में चौहान वंश के राजा ने बालंद को युद्ध में पराजित कर दिया, जिसके बाद उसी वंश ने माता के मंदिर की देखरेख की। तब से हर साल नवरात्र में सुबह की पहली आरती चौहान वंश के वंशज ही यहां करते हैं।
18वीं सदी में चौहान राजाओं ने छत्तीसगढ़ की मूल आदिवासी बैगा जनजाति को माता की देखरेख और पूजा की जिम्मेदारी सौंपी थी। तब से आज तक बैगा समुदाय के लोग ही माता की पूजा करते आ रहे हैं।
5. मां चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर
छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के चंद्रपुर में महानदी के तट पर स्थित मां चंद्रहासिनी देवी का मंदिर एक प्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर महानदी और मांड नदी के संगम के पास स्थित है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, संबलपुर के राजा चंद्रहास ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसके कारण इस स्थान का नाम चंद्रपुर और देवी का नाम चंद्रहासिनी पड़ा। वर्ष 1522 में चंद्रपुर के गोंड राजा धुंध्या राम साह अत्राम ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। गोंड राजाओं ने मां को अपनी कुलदेवी माना और शक्ति पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया।
सक्ती जिले स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन है। मंदिर की सुंदर कलाकृति इसकी प्राचीनता का अनुभव कराती है। लोगों की माता के प्रति गहरी आस्था है। इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि यहां माता सती का बायां कान गिरा था।
वर्ष 1935 में महानदी में भीषण बाढ़ आई थी। तब राजा चंद्रहास के वंशज ठाकुर शशिभूषण ने माता को बकरे की बलि अर्पित कर प्रार्थना की, जिसके बाद नदी का जलस्तर कम हो गया और लोगों की जान बची। आज भी नदी के पास पत्थर पर माता के पदचिह्न मौजूद हैं, जिनकी पूजा की जाती है।
राज्य के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवहनीय पर्यटन को प्रोत्साहित करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। छत्तीसगढ़ में पर्यटन के अनुभव की गुणवत्ता एवं आकर्षण को सुदृढ़ करना, राज्य की समृद्ध एवं विविध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार करना तथा आर्थिक विकास और संबंधित क्षेत्रों में पर्यटन के योगदान में वृद्धि करना भी इसके प्रमुख लक्ष्य हैं।
पर्यटन से संबंधित अधोसंरचना के विकास में निजी निवेशकों के प्रयासों को प्रोत्साहित करना, शासन की भूमिका को सुविधापरक बनाना तथा पर्यटन के क्षेत्र में नई अवधारणाओं, जैसे टाइम शेयर, पारिस्थितिकी पर्यटन और साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। इसके साथ ही स्थानीय समुदाय की बौद्धिक संपदा एवं अधिकारों का सम्मान करना महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ में पर्यटन को उद्योग का दर्जा देने से रोजगार के नए अवसर सृजित होने की संभावना है। शक्तिपीठ परियोजना के माध्यम से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और प्रदेश की पर्यटन क्षमता को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकती है।
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