रायपुर, 31 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादी हिंसा कम होने के बाद विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज हो गई हैं, लेकिन क्षेत्र की प्राचीन पुरातात्विक धरोहरें अब भी संरक्षण के अभाव में असुरक्षित हैं। बीजापुर जिले के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में छिंदक नागवंश और काकतीय राजवंश के समय की सैकड़ों दुर्लभ पाषाण प्रतिमाएं बिखरी हुई हैं। इनकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।
2800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हैं प्राचीन प्रतिमाएं

बीजापुर जिले में लगभग 2800 वर्ग किलोमीटर में फैले इंद्रावती टाइगर रिजर्व का विस्तार महाराष्ट्र और तेलंगाना की सीमा तक है। इस क्षेत्र में 11वीं से 13वीं शताब्दी के छिंदक नागवंश काल और उसके बाद काकतीय राजवंश के समय की सैकड़ों पाषाण प्रतिमाएं मौजूद हैं। इनमें कई ऐसी दुर्लभ प्रतिमाएं भी हैं, जो छत्तीसगढ़ के दूसरे क्षेत्रों में देखने को नहीं मिलतीं। ये मूर्तियां बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत की पहचान हैं।

तीन दशक तक माओवादियों के कब्जे में रहा क्षेत्र
इंद्रावती टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा तीन दशक से अधिक समय तक माओवादी प्रभाव में रहा। सुरक्षा कारणों से पुरातत्व विभाग यहां सर्वेक्षण और संरक्षण का काम नहीं कर पाया। कई बार पुरातात्विक सर्वेक्षण की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन माओवादियों के भय के कारण सर्वेक्षण दल क्षेत्र में जाने से पीछे हट गए।
इसका नतीजा यह हुआ कि आज तक इन धरोहरों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सूचीकरण और फोटोग्राफी तक नहीं हो सकी। अब क्षेत्र में शांति स्थापित होने के बावजूद पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षण को लेकर प्रभावी पहल नजर नहीं आ रही है।
जंगल सफारी शुरू होने से बढ़ सकता है चोरी का खतरा
इंद्रावती टाइगर रिजर्व में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जंगल सफारी शुरू करने की तैयारी की जा रही है। इससे क्षेत्र में पर्यटकों और बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ेगी। ऐसे में पहले से असुरक्षित पड़ी प्राचीन मूर्तियों की चोरी और तस्करी का खतरा भी बढ़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सुरक्षा व्यवस्था की कमी के कारण कई प्रतिमाएं खुले में पड़ी हैं। विभिन्न गांवों से मूर्तियों के गायब होने की खबरें भी सामने आती रही हैं। कुछ ग्रामीण आस्था के चलते इन प्रतिमाओं को अपने घरों में रखकर पूजा करते हैं, जबकि कुछ मामलों में बाहरी तस्करों द्वारा इनके अवैध सौदे किए जाने की आशंका जताई गई है।
ग्राम सभाओं के सहयोग से संरक्षण की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग और वन विभाग को ग्राम सभाओं के साथ मिलकर व्यापक कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। इसके तहत क्षेत्र में मौजूद सभी प्रतिमाओं का सर्वेक्षण, सूचीकरण और फोटोग्राफी कराई जाए। साथ ही उनकी सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक संरक्षण और निगरानी की व्यवस्था भी विकसित की जाए।
संरक्षण के साथ शोध भी जरूरी
शासकीय महाविद्यालय कुटरू के सहायक प्राध्यापक और पुरातात्विक धरोहरों के शोधकर्ता मनकू कोवासी का कहना है कि उन्होंने इंद्रावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में सैकड़ों प्राचीन प्रतिमाएं देखी हैं, जो असुरक्षित स्थिति में हैं। उनका कहना है कि इन धरोहरों को बचाने के लिए संरक्षण के साथ-साथ उन पर शोध करना भी जरूरी है, ताकि बस्तर के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
ऐसे में माओवादी प्रभाव से बाहर निकल रहे बस्तर में विकास और पर्यटन के साथ प्राचीन विरासत को बचाने की जिम्मेदारी भी शासन-प्रशासन को प्राथमिकता से निभानी होगी। समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो बस्तर की यह अनमोल ऐतिहासिक संपदा हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है।


