मीडिया 24 डेस्क
बीजापुर, 15 जुलाई 2025

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों ने एक बार फिर खूनी खेल खेला है। सोमवार सुबह फरसगढ़ थाना क्षेत्र के पीलूर गांव के जंगल से दो शिक्षा दूतों की लाश बरामद हुई है। मृतकों में एक की पहचान विनोद मडे के रूप में हुई है, जो शिक्षा दूत के रूप में कार्यरत था। नक्सलियों ने उन पर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाया है। हालांकि, घटना की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
15 दिनों में 6 हत्याएं, मासूम भी नहीं बख्शे
इस दिल दहला देने वाली घटना से पहले बीजापुर जिले में नक्सली बीते 15 दिनों में मुखबिरी के शक में 6 लोगों की हत्या कर चुके हैं। इनमें 4 ग्रामीण और 2 छात्र शामिल हैं। नक्सली अब बच्चों, छात्रों और पूर्व नक्सलियों के परिजनों को भी निशाना बना रहे हैं।
17 जून को तीन युवाओं की गला घोंटकर हत्या
17 जून को पेद्दाकोरमा गांव में नक्सलियों ने तीन ग्रामीणों की रस्सी से गला घोंटकर हत्या कर दी थी। मृतकों में 13 वर्षीय अनिल माड़वी (7वीं कक्षा का छात्र), 20 वर्षीय सोमा मोड़ियाम (कॉलेज छात्र) और एक अन्य ग्रामीण शामिल था। गांववालों के मुताबिक, करीब 70 से 80 हथियारबंद नक्सली गांव में आए थे और उन्होंने 10 से ज्यादा युवकों को बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा था।
सरेंडर नक्सली के परिजनों को दी मौत
बताया जा रहा है कि मारे गए सभी ग्रामीण सरेंडर कर चुके DVCM कैडर के नक्सली दिनेश मोड़ियम के रिश्तेदार थे। नक्सलियों ने आरोप लगाया कि इन लोगों ने दिनेश को आत्मसमर्पण के लिए उकसाया और उससे पैसे लिए। इसी शक में उनकी निर्मम हत्या कर दी गई।
22 जून को भी दो हत्याएं
22 जून को पामेड़ थाना क्षेत्र के सेंड्राबोर और एमपुर गांव के रहने वाले समैय्या और वेको देवा की हत्या कर दी गई थी। समैय्या पूर्व नक्सली था, जिसने इसी वर्ष आत्मसमर्पण किया था। वेको देवा एक सामान्य ग्रामीण था। दोनों पर भी पुलिस से सांठगांठ का आरोप लगाया गया।
25 साल में 1821 हत्याएं, बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित
छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा की यह श्रृंखला नई नहीं है। राज्य गठन के बाद से बीते 25 वर्षों में नक्सलियों ने बस्तर अंचल में कुल 1821 लोगों की हत्या की है। इनमें आम नागरिकों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं। सबसे ज्यादा हत्याएं बीजापुर जिले में दर्ज की गई हैं, जो आज भी नक्सल हिंसा का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।
नक्सली अब समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग — छात्र, शिक्षक, और पूर्व नक्सलियों के परिजन — को भी टारगेट कर रहे हैं। यह साफ इशारा है कि पुलिस की बढ़ती कार्रवाई से बौखलाए माओवादी अपने खौफ को बनाए रखने के लिए बर्बरता की सीमाएं लांघ रहे हैं।
सरकार और सुरक्षा बलों के लिए यह चुनौती का समय है — जहां एक ओर विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाना है, वहीं दूसरी ओर निर्दोषों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है।





