प्रमोद मिश्रा
बिलासपुर/रायपुर, 07 नवंबर 2025

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में लाल खदान के पास हुए हादसे में 11 जिंदगियां काल के गाल में समा गई । इस वीभत्स हादसे ने कई परिवारों को पूरी तरह से तोड़ दिया और कई को अनाथ कर गया । इस परिवारों में से एक परिवार दो वर्ष के मासूम ऋषि का भी है, जिसे पता तो नहीं कि हुआ क्या है? लेकिन हां, उसके माँ और पिता के साथ उसकी बनी भी अब इस दुनिया में नहीं है । ऐसे में ऋषि जब ईलाज से ठीक होकर बाहर आएगा, तो पता नहीं उसकी देखभाल कौन करेगा ।
बिलासपुर में हुए इस भीषण रेल हादसे ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। लेकिन उसी मलबे के बीच एक जिंदगी बाहर निकल कर आई जिसने हर किसी की आंखें नम कर दी।
हादसे के मलबे से जब राहतकर्मी एक-एक कर लोगों को निकाल रहे थे, तभी मलबे में एक महिला की लाश दिखाई दी। देखने पर ऐसा लग रहा था मानो मां ने आखिरी पल तक बेटे को संभालने की कोशिश की हो।
पहले किसी को लगा दोनों मर चुके हैं पर कुछ पल बाद पास में पड़े बच्चे की हल्की सांसें महसूस हुईं। 2 साल का मासूम ऋषि अपनी मां के पास बेहोश पड़ा था और मौत के बाद भी उसकी मां शीला की बांहें उसे इस तरह से जकड़ी हुई थी जैसे उसका बेटा अब भी उसके सीने से लिपटा हुआ हो।
पास ही उसके पापा अर्जुन यादव और नानी मानमती की लाश पड़ी थी। तीनों की मौत हो चुकी थी, लेकिन शीला की ममता अब भी जिंदा थी क्योंकि इसी पकड़ की वजह से ऋषि की सांसें अभी भी चल रही थीं।
इलाज से लौट रहा था परिवार, रास्ते में हो गया हादसा
ऋषि के मामा राकेश यादव ने बताया कि उनका परिवार जांजगीर से ऋषि के पिता अर्जुन का इलाज कराकर अपने गांव देवरीखुर्द लौट रहा था। ट्रेन शाम करीब साढ़े 4 बजे के आसपास लाल खदान के पास पहुंची थी और यहीं मालगाड़ी से टकरा गई।
हादसे के कुछ ही मिनटों में दर्जनों जिंदगियां खत्म हो गईं। उन्हीं में अर्जुन, शीला और मानमती भी शामिल थीं।
मां की बाहों से बची जान, अब दादी और बुआ की ममता उसका सहारा
हादसे के बाद ऋषि अब पूरी तरह अनाथ हो चुका है । परिवार में अब सिर्फ दादी, बड़े पापा और बुआ हैं, जो उसकी परवरिश करेंगे। गांव में जब उसकी मां शीला की खबर पहुंची, तो माहौल गमगीन हो गया।
खबर मिलने के बाद मॉर्चुरी पहुंची औरतें रोते हुए बस इतना ही कह पाईं शीला अपने बच्चे से बहुत प्यार करती थी, वो बिना ऋषि के कहीं नहीं जाती थी।
महिलाओं ने बताया कि शीला हर वक्त बेटे को गोद में लेकर ही घूमती थी। परिजन बताते हैं कि अगले साल मार्च में ऋषि का दूसरा जन्मदिन मनाने की तैयारी चल रही थी।
शीला अक्सर कहती थी इस बार ऋषि को नया सूट पहनाऊंगी, केक भी कटवाऊंगी। लेकिन किसे पता था कि उसके हाथों में झूला झुलाने वाली वही मां, आखिरी बार उसी की जान बचाने वाली बनेगी।
ऐसे हुआ हादसा
तेज रफ्तार कोरबा पैसेंजर ट्रेन मंगलवार शाम को कोरबा से बिलासपुर की ओर जा रही थी। यह ट्रेन लगभग 77 किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी थी और बिलासपुर पहुंचने में करीब 8 किलोमीटर बाकी थे। शाम करीब 4 बजे के आसपास ट्रेन गतौरा स्टेशन के पास लाल खदान क्षेत्र में पहुंची।
इसी दौरान जिस ट्रैक से पैसेंजर ट्रेन को गुजरना था, उसी लाइन पर पहले से एक मालगाड़ी खड़ी थी। शुरुआती जानकारी के अनुसार, सिग्नल सिस्टम फेल या मानवीय गलती के कारण पैसेंजर ट्रेन को समय पर खतरे का संकेत नहीं मिला।
तेज रफ्तार में चल रही ट्रेन ने आगे खड़ी मालगाड़ी को सीधी टक्कर मार दी, जिससे पैसेंजर ट्रेन का इंजन मालगाड़ी के ऊपर चढ़ गया। ट्रेन का सामने का हिस्सा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और पीछे की बोगियों में बैठे यात्री झटकों से उछल पड़े। कुछ ही सेकेंड में बोगियों में चीख-पुकार मच गई। हादसे में 11 लोगों की मौत हो गई। जबकि 20 घायलों का इलाज जारी है।





