बलौदाबाजार, 05 मई 2026
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक चेतना के सशक्त स्तंभ पं. बंशराज तिवारी का जीवन जनसेवा, न्याय और विकास की अद्वितीय मिसाल रहा है। एक कुशल अधिवक्ता, सिद्धांतनिष्ठ विधायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समर्पित समाजसेवी के रूप में उन्होंने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व से जनसेवा की नई परिभाषा गढ़ी। उन्होंने सत्ता को कभी लक्ष्य नहीं, बल्कि जनहित का साधन माना और अपने सिद्धांतों से जीवनभर कोई समझौता नहीं किया।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
6 मई 1925 को पं. महावीर प्रसाद तिवारी के पुत्र के रूप में जन्मे बंशराज तिवारी तीन बहनों में इकलौते भाई थे। बाल्यावस्था में ही पिता के निधन के बाद उनके कंधों पर जिम्मेदारियां आ गईं, जिनका उन्होंने साहसपूर्वक सामना किया। अल्पायु में ही वे पटेल पद पर आसीन हुए, लेकिन 1940 में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए त्यागपत्र दे दिया। वर्ष 1946 में समाजवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़कर उन्होंने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की।
वकालत : न्याय का माध्यम
एक अधिवक्ता के रूप में उन्होंने न्याय को केवल कानूनी दायरे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवीय संवेदनाओं और नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ा। वकालत उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि वंचित, शोषित और जरूरतमंदों को न्याय दिलाने का माध्यम थी। बलौदाबाजार बार एसोसिएशन के सचिव रहते हुए उन्होंने बलौदाबाजार को जिला बनाने और छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा दिलाने के लिए निरंतर संघर्ष किया।
आपातकाल में लोकतंत्र के प्रहरी
आपातकाल के दौरान जब लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट आया, तब पं. तिवारी ने निर्भीकता से विरोध किया। राजद्रोह जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए उन्होंने रायपुर सेंट्रल जेल में मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे राष्ट्रीय नेताओं के साथ कारावास झेला। इस दौर के बाद वे एक प्रखर वक्ता और जननेता के रूप में उभरे।

विधायक के रूप में विकास की नई इबारत
1977 में जनता पार्टी के टिकट पर वे बलौदाबाजार से विधायक निर्वाचित हुए। मुख्य सचेतक के रूप में उन्होंने क्षेत्र में विकास के कई महत्वपूर्ण कार्य कराए, जिनमें शिवनाथ नदी से जल प्रदाय योजना, अतिरिक्त सत्र न्यायालय की स्थापना, निजी महाविद्यालय का शासकीयकरण, टेलीफोन एक्सचेंज और डाकघर की स्थापना, अस्पताल का विस्तार तथा सड़कों और पुल-पुलियों का निर्माण शामिल है। अपने छोटे से कार्यकाल में ही उन्होंने ‘विकास पुरुष’ के रूप में पहचान बनाई।

परिवार और सामाजिक योगदान
पारिवारिक जीवन में भी उन्होंने उच्च आदर्शों का पालन किया। पत्नी चंदा देवी के साथ मिलकर उन्होंने अपने बच्चों में सेवा, समर्पण और त्याग के संस्कार दिए, जो आज भी प्रेरणास्रोत हैं।
निधन के बाद भी जारी सेवा
9 फरवरी 2006 को उनके निधन के बाद भी परिवार द्वारा पिछले 20 वर्षों से निःशुल्क रोग निदान शिविर का आयोजन कर हजारों मरीजों का उपचार किया जा रहा है। उनकी स्मृति को जीवंत रखने के लिए भूमि दान, मार्ग चौड़ीकरण और सामाजिक संस्थाओं को सहयोग जैसे कार्य निरंतर किए जा रहे हैं। इस बार भी 6 मई को नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया है, जिसमें राज्य नीति आयोग के उपाध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा मौजूद रहेंगे ।
पं. बंशराज तिवारी का संपूर्ण जीवन मानवता को समर्पित रहा। उन्होंने वकालत और सत्ता को जनसेवा और विकास का माध्यम बनाकर एक आदर्श स्थापित किया। वे एक सच्चे जननेता के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे।



