रायपुर, 9 अक्टूबर। प्रेम प्रस्ताव ठुकराने पर बालोद में एक युवती पर एसिड फेंकने की घटना ने महिला सुरक्षा, सामाजिक मानसिकता और प्रेम के वास्तविक अर्थ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर किसी लड़की का ‘ना’ कहना इतना बड़ा अपराध कैसे बन जाता है कि उसकी जिंदगी को तबाह करने की कोशिश की जाती है? यह केवल एक युवती पर हमला नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता, सम्मान और भविष्य पर किया गया प्रहार है।
यह घटना अकेली नहीं है। कुछ दिन पहले प्रेम में असफल होने के बाद एक व्यक्ति द्वारा एक मां को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के उद्देश्य से उसकी चार साल की मासूम बच्ची का अपहरण किए जाने का मामला भी सामने आया था। पुलिस की तत्परता से बच्ची को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर प्रेम के नाम पर हिंसा और बदले की भावना किस हद तक पहुंच सकती है।

## एक पल का हमला, जिंदगी भर का दर्द

जरा सोचिए, यदि वह मासूम बच्ची सुरक्षित नहीं मिलती, तो उसकी मां किस पीड़ा से गुजरती? उसके जीवन का हर दिन और हर रात किस भय और बेचैनी में बीतती? इसी तरह, एसिड अटैक का शिकार हुई युवती के सामने भी अब शारीरिक और मानसिक संघर्ष की लंबी चुनौती है। उसकी पढ़ाई, करियर, आत्मविश्वास और भविष्य से जुड़े सपनों पर इस हमले का गहरा असर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन घटनाओं की कीमत आखिर पीड़ित महिलाओं और उनके परिवारों को ही क्यों चुकानी पड़ती है? गलत मानसिकता किसी और की होती है, अहंकार किसी और का आहत होता है, लेकिन उसका दर्द एक निर्दोष लड़की या मासूम बच्चे को सहना पड़ता है।
## क्या लड़की को ‘ना’ कहने का अधिकार नहीं?
क्या नारी इंसान नहीं है? क्या उसके अपने सपने, इच्छाएं और भावनाएं नहीं हैं? क्या उसे यह तय करने का अधिकार नहीं कि वह किससे प्रेम करे और किसके प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार न करे?
किसी को पसंद करना व्यक्तिगत भावना है, लेकिन उस भावना को दूसरे व्यक्ति पर थोपना प्रेम नहीं हो सकता। किसी लड़की का प्रस्ताव ठुकराना उसकी स्वतंत्रता है, किसी का अपमान करने का निमंत्रण नहीं। ‘ना’ का अर्थ ‘ना’ ही होता है। उसे स्वीकार करना और दूसरे व्यक्ति के फैसले का सम्मान करना ही परिपक्वता है।
यदि कोई व्यक्ति अस्वीकृति को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लेता है और बदला लेने के लिए हिंसा का रास्ता चुनता है, तो यह प्रेम नहीं, बल्कि नियंत्रण और अधिकार जताने की विकृत सोच है।
## राधा-कृष्ण, मीरा और शिव-पार्वती के प्रेम से क्या सीखते हैं हम?
हमारे समाज में प्रेम की चर्चा होती है, तो राधा-कृष्ण के प्रेम का उदाहरण दिया जाता है। मीरा की भक्ति और समर्पण को याद किया जाता है। राम-सीता के रिश्ते और शिव-पार्वती के प्रेम की मिसालें भी सामने रखी जाती हैं।
लेकिन क्या प्रेम का अर्थ केवल किसी को पा लेना है? क्या किसी के इनकार के बाद उसे नुकसान पहुंचाना प्रेम कहलाएगा? यदि प्रेम में सम्मान, विश्वास, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता ही नहीं है, तो वह प्रेम कैसे हो सकता है?
प्रेम किसी पर अधिकार जमाने का नाम नहीं है। प्रेम का अर्थ सामने वाले की इच्छा को समझना, उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार करना और उसके निर्णय का सम्मान करना है। जहां जबरदस्ती, धमकी, हिंसा और बदले की भावना हो, वहां प्रेम का दावा खोखला हो जाता है।
## बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए
महिला सुरक्षा के लिए कानूनों का प्रभावी पालन, अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई और पीड़ितों को बेहतर चिकित्सा, मानसिक सहयोग तथा कानूनी सहायता देना बेहद जरूरी है। एसिड अटैक जैसे अपराधों में पीड़ित को केवल इलाज तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उसके पुनर्वास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान की बहाली के लिए भी प्रयास होने चाहिए।
लेकिन कानून और पुलिस की कार्रवाई के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी उतना ही आवश्यक है। यह बदलाव परिवारों से शुरू होना चाहिए। बेटों को बचपन से सिखाना होगा कि किसी लड़की का इनकार उनकी हार नहीं है। किसी रिश्ते को स्वीकार करना या अस्वीकार करना हर व्यक्ति का अधिकार है।
बच्चों को यह भी समझाना होगा कि गुस्सा, निराशा और असफलता जीवन का हिस्सा हैं। इन भा👍वनाओं से निपटने का रास्ता संवाद और आत्मसंयम है, न कि हिंसा। बेटियों को सुरक्षित वातावरण देना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी बेटों को दूसरों की गरिमा और सीमाओं का सम्मान करना सिखाना भी है।
## सवाल समाज से भी है
जब तक प्रेम को अधिकार और अस्वीकृति को अपमान समझने वाली मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक केवल सख्त कानूनों के भरोसे ऐसी घटनाओं को पूरी तरह रोक पाना कठिन रहेगा। समाज को भी यह तय करना होगा कि वह हिंसा को किसी भी बहाने से उचित ठहराने वाली सोच के साथ खड़ा होगा या पीड़ितों के सम्मान और सुरक्षा के लिए आवाज उठाएगा।
बालोद की युवती और अपहरण की घटना में बचाई गई मासूम बच्ची जैसे मामले हमें याद दिलाते हैं कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
आखिर प्रेम में ‘ना’ सुनने की हिम्मत कब आएगी? कब हम यह समझ पाएंगे कि किसी को चाहना हमारा भाव हो सकता है, लेकिन उसे स्वीकार करने के लिए मजबूर करना हमारा अधिकार नहीं?
जिस दिन हम अपने बेटों को यह सिखा पाएंगे कि प्रेम में सम्मान जरूरी है, अधिकार जताना नहीं; स्वीकार्यता जरूरी है, जबरदस्ती नहीं—उसी दिन समाज में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।
नोट: इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका नम्रता सिंह, उर्मिला फाउंडेशन, रायपुर के व्यक्तिगत विचार हैं।



